अंग्रेज ने दिलाया था भारत को पहला ओलिंपिक मेडल: हॉकी टीम उतारी तो डर गया इंग्लैंड; भारत के पहले मेडल की 9 कहानियां

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स्पोर्ट्स डेस्क15 मिनट पहले

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5 फुट 5 इंच के केडी जाधव ने स्पोर्टस टीचर से कहा कि उन्हें कॉलेज के लिए रेसलिंग करनी है। टीचर ने उनकी हाइट देखते ही उन्हें भगा दिया। जाधव अपने प्रिंसिपल के पास गए और उनसे नाम जुड़वाने की मांग की। प्रिंसिपल ने ट्रायल्स के बाद जाधव का नाम रेसलिंग टीम में जुड़वा दिया।

1948 में अगर उस प्रिंसिपल ने पहल न की होती तो आजाद भारत को रेसलिंग में पहला ओलिंपिक मेडल जीतने के लिए 56 साल और इंतजार करना पड़ जाता। जाधव 1952 ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले भारत के पहले रेसलर बने। उन्हें उसी प्रिंसिपल ने अपना घर बेचकर 7 हजार रुपए दिए थे, ताकि वह ओलिंपिक खेलने के लिए 1952 में हेलसिंकी जा सके।

मॉडर्न ओलिंपिक गेम्स का इतिहास 129 साल पुराना है। 1900 से ओलिंपिक में हिस्सा ले रहा भारत ओलिंपिक में अब तक 35 मेडल ही जीत सका। ये मेडल भी 9 ही खेल में आए। स्टोरी में हम इन 9 खेलों में भारत के पहले मेडल की कहानी जानेंगे…

1. एथलेटिक्स, ट्रैक: सिल्वर, 1900 पेरिस ओलिंपिक

  • पहला मेडल तो हमेशा ही स्पेशल होता है, लेकिन भारत का पहला मेडल स्पेशल के साथ कॉन्ट्रोवर्शियल भी रहा। क्योंकि इसे एक अंग्रेज एथलीट नॉर्मन प्रिचर्ड ने जीता था। इसलिए इसे इंग्लैंड भी क्लैम करता है। 1900 के पेरिस ओलिंपिक में प्रिचर्ड ने 200 मीटर हर्डल्स और 200 मीटर रेस में सिल्वर मेडल जीते थे। यह एथलेटिक्स के ट्रैक इवेंट और ओलिंपिक में भारत का पहला ही ओलिंपिक मेडल रहा।
  • पेरिस ओलिंपिक में नॉर्मन ने 110 मीटर हर्डल्स के फाइनल में भी एंट्री की थी। लेकिन वह मेडल नहीं जीत सके। इनके अलावा उन्होंने 60 मीटर और 100 मीटर रेस में भी हिस्सा लिया, लेकिन दोनों में फाइनल के लिए क्वालिफाई नहीं कर सके।
  • अंग्रेज इतिहासकर कहते हैं कि प्रिचर्ड को 1900 ओलिंपिक में इंग्लैंड ने अपने दल का हिस्सा बनाया था। इसलिए यह मेडल इंग्लैंड का होना चाहिए। हालांकि, प्रिचर्ड ने 1894 से 1900 तक बंगाल में कई स्टेट लेवल कॉम्पिटिशन जीते। वह मेडल जीतने के बात भारत लौटे और 5 साल तक फुटबॉल एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर काम भी किया। आखिर में वह अमेरिका जाकर बस गए थे।
  • प्रिचर्ड का मेडल इसलिए भी भारत को दिया जाता है, क्योंकि उनके जन्म से लेकर पढ़ाई तक का जीवन भारत में ही बीता। उन्होंने कोलकाता के सेंट जेवियर्स कॉलेज से ग्रेजुएशन किया था। प्रिचर्ड का मेडल इसलिए भी स्पेशल है, क्योंकि एथलेटिक्स के ट्रैक इवेंट में भारत इसके अलावा आज तक कोई भी ओलिंपिक मेडल नहीं जीत सका।

2. हॉकी: गोल्ड, 1928 एम्सटर्डम ओलिंपिक

  • फील्ड हॉकी 1908 और 1920 ओलिंपिक गेम्स का हिस्सा रह चुका था। लेकिन, इन दोनों इवेंट में भारतीय हॉकी टीम ने हिस्सा नहीं लिया था। वजह यह थी कि उस समय तक भारत का कोई नेशनल हॉकी फेडरेशन नहीं था। 1925 में भारतीय हॉकी फेडरेशन अस्तित्व में आया और 1928 ओलिंपिक में टीम की भागीदारी सुनिश्चित हुई।
  • एम्सटर्डम जाने के लिए 16 मेंबर्स की टीम चुनी गई। इसमें 9 खिलाड़ी एंग्लो इंडियन थे। एंग्लो इंडियन उन लोगों को कहा जाता है जिनके एक पैरेंट अंग्रेज और एक भारतीय थे। 7 खिलाड़ी पूरी तरह भारतीय थे, इनमें मेजर ध्यानचंद भी थे। इस टीम से अच्छे प्रदर्शन की बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं थी। टीम ओलिंपिक के लिए रवाना होने से पहले बॉम्बे के खिलाफ प्रैक्टिस मैच में भी हार गई थी। टीम जब रवाना हुई तो उसे विदा करने के लिए सिर्फ तीन लोग शिप पर आए थे। ये तीनों उस समय हॉकी फेडरेशन के सदस्य थे।
  • टीम इंग्लैंड होते हुए एम्सटर्डम पहुंची थी। इंग्लैंड में 20 दिन टीम रुकी। इस दौरान उसने एक प्रैक्टिस मैच में इंग्लैंड की नेशनल टीम को 4-0 से हरा दिया। इस हार के बाद इंग्लैंड ने ओलिंपिक से अपनी टीम हटा ली। कहा जाता है कि इंग्लैंड नहीं चाहता था कि उसके एक गुलाम देश की टीम उसे ओलिंपिक में हराए।
  • भारत ने लीग मैचों में ऑस्ट्रिया को 6-0, बेल्जियम को 9-0, डेनमार्क को 5-0 और स्विट्जरलैंड को 6-0 से हराया और नंबर-1 पर रहते हुए फाइनल के लिए क्वालिफाई किया। फाइनल में भारत ने होस्ट नीदरलैंड को 3-0 से हराया।
  • नीदरलैंड के खिलाफ फाइनल मैच से पहले ध्यानचंद बीमार पड़ गए थे। उन्हें तेज बुखार था। ध्यानचंद ने बाद में इस दिन को याद करते हुए कहा था, हमारे मैनेजर ने खिलाड़ियों से कहा था यह डू ऑर डाई का मौका है। मैं आर्मी में था और मेरे लिए देश से बड़ा कुछ नहीं। इसलिए मैं इस मैच में बीमार होने के बावजूद खेला। ध्यानचंद ने फाइनल में दो गोल किए। ध्यानचंद इस ओलिंपिक के टॉप गोल स्कोरर रहे। उन्होंने भारत के 29 में से 14 गोल किए थे। भारतीय टीम के खिलाफ इस ओलिंपिक में एक गोल भी नहीं हुआ।
  • 1928 से भारत ने हॉकी में 8 गोल्ड, 1 सिल्वर और 3 ब्रॉन्ज मेडल मिलाकर सबसे ज्यादा 12 मेडल जीते हैं। देश को पिछला मेडल टोक्यो ओलिंपिक में ब्रॉन्ज के रूप मिला, यह 1980 के बाद हॉकी में भारत का पहला ही मेडल रहा।

3. रेसलिंग: ब्रॉन्ज, 1952 हेलसिंकी ओलिंपिक

  • ग्रीको-रोमन रेसलिंग 1896 से ही ओलिंपिक का हिस्सा है। 1904 में फ्रीस्टाइल रेसलिंग ने डेब्यू किया। 1908 से ग्रीको-रोमन और 1920 से फ्रीस्टाइल रेसलिंग को हर ओलिंपिक में शामिल किया जाने लगा। विमेंस फ्रीस्टाइल को 2004 के एथेंस ओलिंपिक में एंट्री मिली। भारत ने 1920 से रेसलिंग में हिस्सा लिया, लेकिन मेडल नहीं मिला।
  • खशाबा दादासाहेब जाधव भारत के लिए ओलिंपिक में पहला इंडिविजुअल मेडल जीतने वाले खिलाड़ी हैं। उन्होंने 1952 हेलसिंकी ओलिंपिक में कुश्ती का ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। लेकिन ओलिंपिक पॉडियम तक उनका सफर आसान नहीं रहा। 10 साल की उम्र में उन्होंने अपने पिता के साथ रेसलिंग शुरू कर दी। लेकिन केडी जाधव की कहानी शुरू होती है, उनके कॉलेज से।
  • महाराष्ट्र के कोल्हापुर स्थित राजा राम कॉलेज में रेसलिंग टीम का हिस्सा बनने के लिए जाधव ने स्पोर्ट्स टीचर से संपर्क किया। लेकिन टीचर ने उनकी 5 फुट 5 इंच हाइट देखते ही उन्हें टीम में एंट्री देने से मना कर दिया। 23 साल के केडी सीधे कॉलेज प्रिंसिपल के पास गए और उनसे टीम में एंट्री की मांग कर दी। प्रिंसिपल ने ट्रायल्स के बाद जाधव को कॉलेज टीम का हिस्सा बनाया।
  • जाधव ने अपनी टेक्निक के दम स्टेट और नेशनल लेवल के कई कॉम्पिटिशन जीते। कॉलेज में रेसलिंग इवेंट के दौरान कोल्हापुर के महाराजा की नजर उन पर पड़ी। राजा इतने खुश हुए कि उन्होंने 1948 के लंदन ओलिंपिक में केडी जाधव की ट्रिप का पूरा खर्च उठा लिया। अखाड़ों में लड़ने वाले जाधव ओलिंपिक मैट पर छठे नंबर पर रहे।
  • लंदन ओलिंपिक की हार के बाद उन्होंने अपनी प्रैक्टिस बढ़ाई, लेकिन उन्होंने 1952 में हेलसिंकी ओलिंपिक के लिए रेसलिंग टीम में मौका नहीं मिला। उन्होंने 6 फुट लंबे नेशनल चैंपियन निरंजन दास को 2 बार हराया था। उन्होंने पटियाला के महाराजा से इस बारे में कम्प्लैन की, जिन्होंने नेशनल चैंपियन से एक और बार लड़ने को कहा। जाधव ने फिर एक बार दास को हरा दिया, जिसके चलते उन्हें रेसलिंग टीम का हिस्सा बनाया गया।
  • हालांकि, 1952 ओलिंपिक के लिए उन्हें फंडिंग नहीं मिल सकी। 27 साल के रेसलर ने गांव-गांव जाकर पैसा मांगा, लेकिन उन्हें सबसे बड़ी मदद अपने कॉलेज प्रिंसिपल से ही मिली। जिन्होंने अपना घर गिरवी रखकर तब 7 हजार रुपए जुटाए और उन्हें ओलिंपिक खेलने भेजा।
  • जाधव ने कनाडा और मेक्सिको के टॉप रेसलर्स को हराया। उन्होंने तीसरा मैच जीता, और कुछ देर बाद ही गोल्ड जीतने वाले शोहाची इशी से भिड़ गए। थकान के कारण वह हार गए। शुरुआती जीत का फायदा उन्हें मिला और उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम कर लिया।
  • आजाद भारत का पहला इंडिविजुअल मेडल लेकर जाधव जब देश लौटे तो 100 से ज्यादा बैलगाड़ियों से पहुंचे देशवासी उनका स्वागत करने आ गए। रेलवे स्टेशन से उनके घर का रास्ता 15 मिनट का था, लेकिन इसके लिए उन्हें 7 घंटे लग गए। ओलिंपिक रेसलिंग में इसके बाद भारत को सीधे 56 साल बाद 2008 में मेडल मिला, यहां से भारत ने हर ओलिंपिक में रेसलिंग मेडल तो पक्का जरूर किया। रेसलिंग में भारत ने 2 सिल्वर और 5 ब्रॉन्ज जीते हैं।

4. टेनिस: ब्रॉन्ज, 1996 अटलांटा ओलिंपिक

  • ‘पहला सेट हारने के बाद दूसरे सेट में भी मैं पिछड़ रहा था। तभी कुछ चमत्कारिक हुआ, जीवन के वह 45 मिनट मैं कभी नहीं भूलूंगा। एथलीट्स उसे ‘अपना जोन’ कहते हैं। उन 45 मिनट ने मुझे ओलिंपिक मेडल दिला दिया।’ ये कहना था 1996 के अटलांटा ओलिंपिक में ब्रॉन्ज मेडल जीतने वाले भारत के टेनिस प्लेयर लिएंडर पेस का।
  • टेनिस इतिहास में यह भारत का इकलौता ओलिंपिक मेडल है। 1996 में भारत ने इसके अलावा भी कोई मेडल नहीं जीता। लिएंडर पेस ओलिंपिक के टेनिस इवेंट में मेडल जीतने वाले पहले ही एशियन एथलीट भी हैं। पेस ने उस मैच के बारे में बताते हुए आगे कहा, ‘दूसरे सेट में ब्रेक पॉइंट बचाकर मैंने स्कोर 2-2 कर दिया। इस सेट में 5-4 की बढ़त लेते ही मुझे भरोसा हुआ कि मैं मैच जीत सकता हूं।’
  • पेस आगे कहते हैं, ‘मुझे तो पॉइंट्स भी याद तक नहीं थे, इसलिए मुझे मैच चमत्कार जैसा लगा। जब आप 140 करोड़ लोगों के लिए ओलिंपिक या डेविस कप में खेलते हों, तो आप एक अलग अहसास फील करते हो। मैंने उस दिन उसी फीलिंग को महसूस किया था।’
  • 1996 के ओलिंपिक में पेस 126वीं रैंक के साथ वाइल्ड कार्ड प्लेयर के रूप में उतरे। इसके बावजूद उन्होंने लगातार 4 मैच जीतकर सेमीफाइनल में जगह बना ली, लेकिन आंद्रे अगासी से हार का सामना करना पड़ गया। मैच के बाद उन्हें कलाई में चोट लग गई, 24 घंटे बाद ही उन्हें ब्रॉन्ज मेडल मैच खेलना था। उन्होंने चोट पर काबू पाया और फर्नांडो मेलिगेनी के खिलाफ रोमांचक मुकाबला जीतकर भारत को मेडल दिलाया। पेस के मेडल की खास बात यह रही कि 1996 से भारत ने हर ओलिंपिक में कम से कम एक मेडल तो जरूर जीता है।

5. वेटलिफ्टिंग: ब्रॉन्ज, 2000 सिडनी ओलिंपिक

  • पिछले 3 ओलिंपिक गेम्स में भारत का मेडल काउंट बढ़ाने में महिलाओं की हिस्सेदारी 47% तक रही है। लेकिन क्या आप जानते हैं, भारत को विमेंस कैटेगरी का पहला ओलिंपिक मेडल जीतने में 104 साल लग गए। जी हां, 1896 में शुरू हुए ओलिंपिक की विमेंस कैटेगरी का पहला मेडल भारत ने 2000 के सिडनी ओलिंपिक में जीता। जब कर्णम मल्लेश्वरी ने वेटलिफ्टिंग का ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया, यह इस खेल में भी भारत का पहला ही मेडल रहा।
  • ‘एक लड़की ने ओलिंपिक मेडल जीता तो देश चौंक गया।’ मेडल जीतने के बाद कर्णम के मुंह से यही शब्द निकले। उनके पिता कॉलेज लेवल फुटबॉल प्लेयर थे और उनकी 4 बहनें भी वेटलिफ्टिंग करती थीं। इसके बावजूद उन्हें ये महसूस हुआ कि भारतवासियों को किसी महिला से ओलिंपिक मेडल की उम्मीद नहीं है। ये बात अलग है कि कर्णम को स्पोर्ट्स फॉलो करने के लिए उनकी मां ने ही इंस्पायर किया था।
  • 12 साल की उम्र में उन्होंने वेटलिफ्टिंग शुरू की, लेकिन लोकल कोच ने उन्हें कम वजन के चलते अपनी एकेडमी में एंट्री नहीं दी। यहां से उन्हें मां का साथ मिला। उन्होंने वेटलिफ्टिंग जारी रखी और 1990 की नेशनल जूनियर चैंपियनशिप में हिस्सा लिया। 52 किग्रा कैटेगरी में उन्होंने 9 नेशनल रिकॉर्ड तोड़े। यहीं से उनका गोल्डन पीरियड भी शुरू हो गया।
  • 1993 की वर्ल्ड चैंपियनशिप में कर्णम ने ब्रॉन्ज जीता, अगले ही साल उन्होंने इसे गोल्ड में बदल लिया। एशियन गेम्स में सिल्वर के बाद उन्होंने वर्ल्ड चैंपियनशिप में लगातार 3 गोल्ड जीते। 2000 में फिर उन्होंने 69 किग्रा कैटेगरी में हिस्सा लिया, यह कैटेगरी उनके लिए नई थी। इसके बावजूद उन्होंने हंगरी और चीन की वेटलिफ्टर को तगड़ा चैलेंज दिया और ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया।
  • कर्णम मल्लेश्वरी से इंस्पायर होकर पिछले 3 गेम्स में भारत की महिलाएं 7 ओलिंपिक मेडल जीत चुकी हैं। 2016 के रियो ओलिंपिक में तो भारत को दोनों मेडल महिलाओं ने ही दिलाए थे। वेटलिफ्टिंग में भारत को दूसरा मेडल भी विमेंस कैटेगरी में ही मिला, जब टोक्यो ओलिंपिक में मीराबाई चानू ने सिल्वर मेडल जीतकर इतिहास रचा। वह इस बार भी वेटलिफ्टिंग में भारत की दावेदारी पेश करेंगी।

6. शूटिंग: सिल्वर, 2004 एथेंस ओलिंपिक

  • 1999 कारगिल वॉर में आर्मी कर्नल रहे राज्यवर्धन सिंह राठौड़ ने भारत को शूटिंग में पहला ओलिंपिक मेडल दिलाया। आर्मी से निकलकर शूटिंग में उन्होंने अपना करियर बनाया और 2004 के एथेंस ओलिंपिक में सिल्वर मेडल जीता। उनकी जीत ने देश के शूटर्स को इंस्पायर किया। जिसके चलते भारत ने इस खेल में 4 मेडल और जीत लिए, जिनमें 1-1 गोल्ड और सिल्वर के साथ 2 ब्रॉन्ज शामिल है। 2024 ओलिंपिक में भी भारत को पहला मेडल शूटिंग में ही मिला।
  • एथेंस ओलिंपिक में भारत ने 73 एथलीट्स उतारे, लेकिन राज्यवर्धन मेडल जीतने वाले इकलौते भारतीय बनकर उभरे। अपने मिलिट्री एकेडेमी के दिनों में उन्हें बेस्ट स्पोर्ट्समैन माना जाता था। कश्मीर में उन्होंने एक सैनिक दल को लीड किया था, इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि शूटिंग भी उनके लिए नई नहीं था।
  • राज्यवर्धन ने 28 साल की उम्र में 1998 में पहली बार स्पोर्ट्स गन का इस्तेमाल किया। क्योंकि 1998 में इंडियन आर्मी ने अपनी शूटिंग टीम बनाने का फैसला किया। राठौड़ इस टीम का हिस्सा रहे, उन्होंने भारत को भी लीड किया और 2002 के कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल जीत लिए।
  • ओलिंपिक के लिए राठौड़ हर दिन 80 शॉट्स मारने की प्रैक्टिस करते थे। एथेंस में उन्होंने डबल ट्रैप शूटिंग में हिस्सा लिया। लेकिन रैंकिंग राउंड में वह पांचवें नंबर पर रहे। यूएई से पहली बार ही हिस्सा ले रहे शेख अहमद ने गोल्ड मेडल जीत लिया। हालांकि, सिल्वर मेडल के लिए राठौड़ के साथ 3 शूटर्स अब भी रेस में थे।
  • सिल्वर जीतने के लिए राठौड़ को आखिरी 2 शॉट्स टारगेट पर रखने थे। उन्होंने ऐसा ही किया और 200 में से 179 के स्कोर के साथ सिल्वर मेडल जीत लिया। मेडल जीतने के बाद वह बोले, ‘ओलिंपिक मेडल जीतना किसी भी स्पोर्ट्सपर्सन के लिए प्राउड की बात है। मैंने भी शूटिंग में भारत को पहला मेडल दिलाने के बाद यही महसूस किया।’

7. बॉक्सिंग: ब्रॉन्ज, 2008 बीजिंग ओलिंपिक

  • सरकारी नौकरी पाने के लिए बॉक्सिंग शुरू करने वाले विजेंदर सिंह का नाम इतिहास में अमर हो गया। जब 2008 के बीजिंग ओलिंपिक में उन्होंने देश को बॉक्सिंग में पहला ओलिंपिक मेडल जिता दिया। उन्होंने ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया था, उनके बाद भारत ने इस खेल में 2 और ओलिंपिक मेडल जीते। दोनों महिला बॉक्सर्स ने दिलाए।
  • विजेंदर ने अपना शुरुआती जीवन इसी सोच में बिता दिया कि उन्होंने बॉक्सिंग में भारत को मेडल जिताए तो उनकी सरकारी नौकरी पक्की हो जाएगी। उन्हें फिर कमाई के लिए ज्यादा सोचना नहीं पड़ेगा। उन्होंने अपनी किताब ‘माय ओलिंपिक जर्नी’ में कहा था, ‘शुरुआत में तो मेरे लिए बॉक्सिंग बस सरकारी नौकरी पाने का ही जरिया थी। इसे मानना मुश्किल है, लेकिन भारत में गांवों से निकलने वाले ज्यादातर खिलाड़ी इसी सोच से खेलों में आते हैं।’
  • स्टेट और नेशनल लेवल पर खेलते हुए विजेंदर को नौकरी नहीं मिली। उन्हें फिर पता लगा कि ओलिंपिक खेलने से नौकरी मिल सकती है। उन्होंने 2004 के एथेंस ओलिंपिक के लिए क्वालिफाई किया और खुद पर ओलिंपियन का टैग लगवाया। हालांकि, वह पहले ही राउंड में हारकर बाहर हो गए। इसी ओलिंपिक में मेडल विजेता बॉक्सर को देख विजेंदर ने सोचा कि वह भी पोडियम फिनिश कर सकते हैं।
  • विजेंदर ने अपने खेल पर काम किया, उन्होंने एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ और एशियन चैंपियनशिप में मेडल जीते। विजेंदर ने फिर बीजिंग ओलिंपिक में लगातार 2 बाउट जीती और क्वार्टर फाइनल में जगह बना ली। भारत शूटिंग में गोल्ड और रेसलिंग में ब्रॉन्ज जीत चुका था, इसलिए बॉक्सिंग में भी उम्मीदें बढ़ गईं। विजेंदर ने इन उम्मीदों को कायम रखा और क्वार्टर फाइनल जीतकर अगले राउंड में जगह बनाई और मेडल पक्का कर लिया।
  • विजेंदर सेमीफाइनल हार गए, लेकिन बॉक्सिंग में सेमीफाइनल हारने वाले दोनों बॉक्सर्स को ब्रॉन्ज मेडल दिया जाता है। इसलिए विजेंदर भारत को बॉक्सिंग का ओलिंपिक मेडल दिलाने वाले पहले बॉक्सर बन गए। मेडल जीतने के बाद उन्हें इंडियन रेलवे और हरियाणा पुलिस ने नौकरी का ऑफर दिया। लेकिन उन्होंने बॉक्सिंग जारी रखी और इसी फील्ड में अपना करियर आगे बढ़ाया।

8. बैडमिंटन: ब्रॉन्ज, 2012 लंदन ओलिंपिक

  • 1992 ओलिंपिक में पहली बार शामिल हुए बैडमिंटन में भारत 2008 तक कोई मेडल नहीं जीत सका। 2012 में फिर साईना नेहवाल ने भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया, इसी के साथ वह इस खेल में ओलिंपिक मेडल जीतने वाली पहली भारतीय बनीं। उनके बाद पीवी सिंधु ने 2016 और 2020 में लगातार 2 ओलिंपिक में भारत को बैडमिंटन मेडल दिलाए।
  • साईना ने 16 साल की उम्र में ही एशियन गेम्स के लिए क्वालिफाई कर लिया। पुलेला गोपीचंद से ट्रेनिंग के बाद उनसे 2008 ओलिंपिक में मेडल की उम्मीद थी, लेकिन वह चूक गईं। हालांकि, वह क्वार्टर फाइनल में पहुंचने वाली पहली ही भारतीय शटलर बनीं। इसे याद करते हुए साईना कहती हैं, ‘पीछे मुड़ते हुए मुझे लगता है कि मैं बीजिंग में भी मेडल जीत सकती थी। लेकिन पहले ही ओलिंपिक में मैं खुद से बहुत ज्यादा उम्मीद भी नहीं कर सकती।’
  • साईना ने बुक ‘माय ओलिंपिक जर्नी’ में लिखा, ‘2008 में हारते ही मैंने 2012 की तैयारी शुरू कर दी। अगले ही दिन सुबह 5 बजे मैं प्रैक्टिस करने पहुंच गई थी।’ अगले 4 साल साईना ने BWF के कई टूर्नामेंट जीते। इनमें कॉमनवेल्थ गोल्ड भी शामिल रहा। 2012 ओलिंपिक से पहले वह टॉप क्लास फॉर्म में थीं, लेकिन पहले मैच से 7 दिन पहले उन्हें बुखार हो गया।
  • बुखार के बावजूद साईना ने शुरुआती 3 मैच 2-2 गेम में ही जीत लिए। क्वार्टर फाइनल में उनका सामना टिने बौन से हुआ, यहां साईना के जीतने की उम्मीदें कम थीं। लेकिन उन्होंने 21-15, 22-20 से 2 ही गेम में मैच खत्म कर दिया। सेमीफाइनल से पहले साईना को कमजोरी महसूस हुई, मुकाबला चीन का वांग यीहान से था।
  • साईना ने इस मुकाबले पर लिखा है, ‘सेमीफाइनल में मैं अपने गेम को एडवांस लेवल पर नहीं ले जा सकीं। स्टैमिना और बुखार के कारण मैंने अपना 100% नहीं दिया। मैं लंदन में गोल्ड जीतने के इरादे से उतरी थी।’ साईना सेमीफाइनल हार गईं, लेकिन ब्रॉन्ज मेडल मैच सीधे गेम में जीतकर भारत को बैडमिंटन में पहला मेडल दिला दिया।

9. एथलेटिक्स, फील्ड: गोल्ड, टोक्यो 2020

  • नीरज चोपड़ा, इंडियन एथलेटिक्स के पोस्टर बॉय बन चुके हैं। टोक्यो ओलिंपिक में उनकी गोल्ड मेडल विनिंग परफॉर्मेंस कौन ही भारतीय भूल सकता है। 7 अगस्त 2021 को टोक्यो में जब उन्होंने गोल्ड जीता तो पूरा देश जश्न में डूब गया। उनकी कामयाबी इतनी बड़ी रही कि भारत सरकार ने 7 अगस्त को ‘नेशनल जैवलिन डे’ के नाम से घोषित ही कर दिया।
  • नीरज ने टोक्यो ओलिंपिक में पाकिस्तान और जर्मनी के टॉप एथलीट्स को पछाड़ा और 87.58 मीटर दूर भाला फेंक कर देश को एथलेटिक्स में पहला गोल्ड मेडल दिला दिया। एथलेटिक्स के फील्ड इवेंट में यह देश का पहला ही मेडल रहा। जो ओलिंपिक में 126 साल बाद मिल सका। उनकी परफॉर्मेंस ने भारत में एथलेटिक्स को नई पहचान दिलाई।
  • नीरज ने फाइनल में जो थ्रो फेंका, वह उनका बेस्ट थ्रो नहीं था। उन्होंने 30 जून 2022 को डायमंड लीग में 89.94 मीटर की दूरी पर जैवलिन फेंका और अपना बेस्ट स्कोर दिया। नीरज से पेरिस ओलिंपिक में 90 मीटर का स्कोर छूने के साथ गोल्ड मेडल जीतने की उम्मीदें हैं। उनके सामने पाकिस्तान के अरशद नदीम, जर्मनी के जुलियन वेबर और चेक रिपब्लिक के याकुब वादलेच की चुनौती होगी।

*ग्राफिक्स: अंकित पाठक

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