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26 अगस्त 1972। जर्मनी की राजधानी बर्लिन में 20वें ओलिंपिक की शुरुआत हुई। जर्मनी को 36 साल बाद ओलिंपिक की मेजबानी मिली थी। वो कोई गड़बड़ी नहीं चाहता था। खिलाड़ियों की सुरक्षा को लेकर भी कड़े इंतजाम किए गए। स्टेडियम में सुरक्षाकर्मियों को साधारण कपड़ों
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इस इंतजाम में आयोजन के 11वें दिन बड़ी सेंध लगी, जब ओलिंपिक विलेज में आतंकी घुस गए और 11 इजराइली खिलाड़ियों को बंधक बना लिया।
‘ओलिंपिक के किस्से’ सीरीज के चौथे एपिसोड में ऐसी घटनाएं जिन्होंने ओलिंपिक आयोजन में खौफ पैदा कर दिया…
म्यूनिख ओलिंपिक में मारे गए 11 इजराइली एथलीट
5 सितंबर 1972, म्यूनिख ओलिंपिक का 11वां दिन। तड़के साढ़े 4 बजे फिलिस्तीनी उग्रवादी संगठन ब्लैक सेप्टेंबर के आठ आतंकी दीवारें फांदकर ओलिंपिक विलेज में दाखिल होते हैं। एथलीट के भेष में आतंकी सीधे उस हिस्से में पहुंचे जहां इजराइली एथलीट रुके हुए थे। उन्होंने सभी एथलीट को बंदूक की नोक पर इकट्ठा किया।
इस दौरान रेसलर मोशे वेनबर्ग और वेटलिफ्टर योसेफ रोमानो ने आतंकियों का प्रतिरोध किया, तो उन्हें गोली मार दी गई। बाकी 9 लोग अब भी आतंकियों के कब्जे में थे।
इजराइली एथलीट्स के अपार्टमेंट के बाहर तैनात जर्मन पुलिस का जवान।
खिलाड़ियों को कब्जे में लेने के बाद आतंकियों ने इजराइली सरकार के सामने मांग रखी कि इजराइली जेलों में बंद 200 फिलिस्तीनियों और वेस्टर्न जर्मनी में बंद दो आतंकियों को छोड़ा जाए। साथ ही आतंकियों ने खुद को मिडिल ईस्ट में सुरक्षित स्थान तक पहुंचने के लिए हवाई जहाज की भी मांग की। रात 10 बजे तक मांगें मान ली गईं।

इजराइली खिलाड़ियों के अपार्टमेंट में आतंकियों के जाने के बाद खून फैला मिला।
रात साढ़े 10 बजे आतंकी, हाथ-पैर और आंखों पर काली पट्टी बांधकर एथलीट्स को दो हेलिकॉप्टर से लेकर 25 किमी दूर फुरस्टेनफेल्डब्रुक एयरबेस चले गए। जहां जर्मन पुलिस छिपकर आतंकियों पर नजर रख रही थी।
हवाई पट्टी के निरीक्षण के लिए दो आतंकी नीचे उतरे और उन्हें जर्मन पुलिस के वहां होने की भनक लग गई। आतंकियों ने अपने बाकी साथियों को इसके बारे में चिल्ला कर बताया। इतने में पुलिस की तरफ से गोलीबारी शुरू हो गई। गोलीबारी में कुछ आतंकवादी और पुलिस अधिकारी मारे गए।
बचे हुए आतंकी और पुलिस अफसर सुरक्षित स्थानों पर छिप गए, लेकिन आपस में बंधे हुए खिलाड़ी बीच में ही फंसे रह गए। इसी बीच आतंकियों ने फ्लडलाइट्स पर गोलियां बरसा कर बुझा दीं और गोलीबारी जारी रखी। आधी रात के वक्त एक जर्मन अधिकारी ने टीवी पर घोषणा कर दी कि सभी आतंकी मारे जा चुके हैं और एथलीट्स को छुड़ा लिया गया है, लेकिन यह अनाउंसमेंट जल्दबाजी में की गई थी।

आतंकियों के हमले के बाद जला हुआ हेलिकॉप्टर, जिसमें खिलाड़ियों को लाया गया था।
आधी रात के ठीक बाद एक आतंकी ने एक हेलिकॉप्टर पर हथगोला फेंका जिसमें चार इजराइली एथलीट की मौत हो गई। एक अन्य आतंकी ने दूसरे हेलिकॉप्टर पर गोलियां बरसा दीं। जिसके चलते बाकी बचे 5 एथलीट भी मारे गए। रात करीब 12:30 बजे तक गोलीबारी बंद हो गई। इसमें 11 इजराइली एथलीट समेत एक जर्मन पुलिसकर्मी और पांच आतंकी मारे गए। जबकि किसी तरह तीन आतंकियों को पकड़ लिया गया।
अगले दिन मारे गए एथलीटों को श्रद्धांजलि देने के लिए ओलिंपिक खेलों को 24 घंटे के लिए स्थगित कर दिया गया। उसके बाद खेल फिर से शुरू हो गए, लेकिन इजराइली एथलीट अपने देश वापस लौट चुके थे।

हमले के एक दिन बाद द सन न्यूजपेपर का फ्रंट पेज।
जब मेक्सिको में ओलिंपिक का विरोध करने वाले 200 छात्रों की हत्या हुई
1972 से पहले 1968 के ओलिंपिक पर खून के दाग लग चुके थे। 2 अक्टूबर 1968, ओलिंपिक की ओपनिंग सेरेमनी से ठीक दस दिन पहले हजारों की संख्या में छात्र मेक्सिको सिटी के ट्लाटेलोल्को प्लाजा नाम के स्थान पर इकट्ठा हुए। छात्रों की मांग थी कि सरकार ओलिंपिक पर ढेर सारा पैसा खर्च करने के बजाय इसे देश के और लोगों के हित में लगाए।
छात्रों का आंदोलन शांतिपूर्ण था, लेकिन मेक्सिको सरकार को कुछ और मंजूर था। प्लाजा के आस-पास की छतों पर 300 से ज्यादा सरकारी स्नाइपर्स तैनात थे। अचानक ही स्नाइपर्स निशाना साधते हैं और छात्रों पर गोली बरसाना शुरू कर देते हैं। अगले कुछ मिनटों में ट्लाटेलोल्को प्लाजा 200-300 शवों से भर गया। घटना में हजारों लोग घायल भी हुए।

ट्लाटेलोल्को प्लाजा पर मारे गए मेक्सिकन छात्रों की याद में बनाया गया स्मारक।
10 दिन बाद शुरू हुए ओलिंपिक खेलों में भी इस हत्याकांड का प्रभाव देखा गया। कई खिलाड़ियों ने मृतकों को अपने ढंग से श्रद्धांजलि दी। जिसके बदले उन्हें कई तरह के प्रतिबंध भी झेलने पड़े। 1968 और 1972 के खूनी खेल के बाद ओलिंपिक में बॉयकॉट का दौर शुरू हुआ।
जब न्यूजीलैंड की रग्बी टीम के कारण अफ्रीकी देशों ने खिलाड़ियों को वापस बुलाया
1976 में फ्रांस के मॉन्ट्रियल में ओलिंपिक होने थे। आयोजन की ओपनिंग सेरेमनी से ठीक एक दिन पहले 30 से ज्यादा अफ्रीकी और अरब देशों ने रंगभेद के कारण अपने खिलाड़ियों को वापस बुला लिया। इसके चलते कई इवेंट्स में खिलाड़ियों को बिना खेले विजेता घोषित करना पड़ा। टीमों की अनुपस्थिति में आयोजकों को दर्शकों को टिकट के पैसे वापस लौटाने पड़े।
अफ्रीकी देशों ने ओलिंपिक से पीछे हटने का फैसला क्यों किया?
दरअसल, 1976 में न्यूजीलैंड की रग्बी टीम ने रंगभेद के खिलाफ कानून बनाने वाले दक्षिण अफ्रीका का दौरा किया था। हालांकि रग्बी ओलिंपिक का हिस्सा नहीं था। इसी अफ्रीका में आयोजन के एक महीने पहले सोवेटो हत्याकांड हुआ था, जिसमें दक्षिण अफ्रीकी पुलिस ने रंगभेद का विरोध कर रहे सैकड़ों ब्लैक लोगों को मौत के घाट उतार दिया था।

1976 ओलिंपिक से वापस लौटने के दौरान एयरपोर्ट पर केन्या के खिलाड़ी।
ओलिंपिक का बॉयकॉट करने वाले देश न्यूजीलैंड को दक्षिण अफ्रीका का पक्षधर मानते हुए उसे ओलिंपिक से बैन करने की मांग कर रहे थे। हालांकि मांग नहीं मानी गई जिसके चलते इन देशों ने अपने खिलाड़ियों को वापस बुला लिया। जबकि रंगभेद के कारण दक्षिण अफ्रीका को 1964 से 1992 तक ओलिंपिक से बैन झेलना पड़ा।
हालांकि इस बॉयकॉट के अलावा भी 1976 के ओलिंपिक से कई कड़वी यादें जुड़ी थीं। इस आयोजन के बाद कनाडा 1.6 बिलियन कनाडाई डॉलर के कर्ज में डूब गया। जिससे उबरने में उसे कई साल लगे, लेकिन ओलिंपिक अपने बॉयकॉट ट्रेंड से जल्दी नहीं उबर सका। यह अगले दो आयोजन तक जस का तस बना रहा।
अफगानिस्तान पर हमला, 60 देशों ने छोड़ा मॉस्को ओलिंपिक
24 दिसम्बर 1979, क्रिसमस के ठीक एक दिन पहले सोवियत संघ ने अपने पड़ोसी देश अफगानिस्तान के शहरों में हवाई जहाज से ट्रूप्स उतारने शुरू कर दिए। जब तक अफगानी सरकार कुछ समझ पाती, बॉर्डर की तरफ से भी सोवियत सैनिकों ने जंग का ऐलान कर दिया।
अगले कुछ ही दिनों में सेना अफगानी राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गई और राष्ट्रपति समेत सभी मंत्रियों को जहर देकर मार डाला। अफगान में तख्तापलट कर बबरक करमल को सोवियत की तरफ से कठपुतली शासक बनाया गया। यहां से अफगानिस्तान में गृहयुद्ध की शुरुआत हुई जो अगले एक दशक तक चली।

मॉस्को ओलिंपिक 1980 की ओपनिंग सेरेमनी की तस्वीर।
अफगान में सैन्य दखल का खामियाजा सोवियत यूनियन को 1980 के ओलिंपिक में भुगतना पड़ा। इसका आयोजन USSR की राजधानी मॉस्को में किया गया, लेकिन इन खेलों को जबरदस्त बॉयकॉट का सामना करना पड़ा, जिसका कारण सोवियत-अफगान वॉर था।
सोवियत यूनियन के धुर विरोधी देश अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने इस बॉयकॉट ट्रेंड की अगुआई की। सोवियत यूनियन के अफगान हमले के खिलाफ इस बॉयकॉट में 60 से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया। कार्टर ने आईओसी के सामने यह भी प्रस्ताव रखा कि वो ग्रीस को ओलिंपिक का परमानेंट होस्ट बनाए। जिससे आयोजन को लेकर राजनीति ना हो सके, लेकिन आईओसी ने प्रस्ताव ठुकरा दिया।
खेलों के दौरान भी खिलाड़ियों और खेलों को कई तरह के प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा। 1980 ओलिंपिक की मेडल टैली भी 1904 के खेलों के बाद सबसे असंतुलित रही।
1984 में USSR ने लिया बदला, 14 देशों ने ओलिंपिक में नहीं भेजे खिलाड़ी
1980 के बॉयकॉट का बदला USSR ने 1984 के ओलिंपिक में लिया। इस बार का आयोजन लॉस एंजिलिस में होना था। खेल शुरू होने से कुछ महीनों पहले ही USSR ने अमेरिका पर खेलों के सहारे राजनीति भड़काने का आरोप लगाया। उसने लॉस एंजिलिस में अपने खिलाड़ियों की जान को खतरा बताते हुए सोवियत यूनियन खिलाड़ियों को भेजने से मना कर दिया।
सोवियत यूनियन की तरह 13 और देशों ने 1984 ओलिंपिक में अपने खिलाड़ियों को भेजने से इनकार कर दिया। पिछली बार की तरह इस बार भी मेडल टैली और कॉम्पिटिशन पर बॉयकॉट का असर दिखा।

सोवियत यूनियन के ओलिंपिक छोड़ने की खबर।
1988 में ओलिंपिक गेम्स साउथ कोरिया की राजधानी सियोल में खेले गए। ये खेल भी पॉलिटिक्स और बॉयकॉट से जूझते दिखे। 80 के दशक में साउथ कोरिया में चल रहे जून डेमोक्रेटिक स्ट्रगल का प्रभाव भी ओलिंपिक पर दिखा।
इसी दौरान साउथ कोरिया नॉर्थ कोरिया के साथ युद्ध से भी जूझ रहा था। नॉर्थ कोरिया ने IOC से ओलिंपिक को-होस्टिंग की मांग की, जिसे ठुकरा दिया गया। इसके बदले में उत्तर कोरिया ने ओलिंपिक का बहिष्कार किया जिसमें उसे क्यूबा और इथियोपिया जैसे देशों का साथ मिला। हालांकि इन घटनाओं का खेलों पर ज्यादा प्रभाव नहीं दिखा।
1992 के बर्सिलोना ओलिंपिक से चीजें बेहतर होना शुरू हुईं। 1991 में शीत युद्ध खत्म हुआ जिससे वैश्विक राजनीति के उबाल में शांति देखने को मिली। 1992 में संयुक्त जर्मनी की वापसी हुई। रंगभेद खत्म करने और डेमोक्रेसी स्थापित करने के बाद दक्षिण अफ्रीका की भी वापसी हुई, लेकिन नई सदी से पहले एक और अटैक ओलिंपिक का इंतजार कर रहा था।
1996 ओलिंपिक में स्टेडियम से कुछ दूर हुआ बम ब्लास्ट
1996 ओलिंपिक खेल जॉर्जिया में आयोजित किए गए। 27 जुलाई 1996 को ओलिंपिक स्टेडियम से कुछ ही दूरी पर सेंटेनियल ओलिंपिक पार्क में हो रहे एक म्यूजिक कॉन्सर्ट में विस्फोट हुआ। जिसमें 2 लोगों की मौत हो गई। जबकि 100 से ज्यादा लोग घायल हुए।
हमले में इस्तेमाल बम हाथ से बना हुआ पाइप बम था जिसे घर पर बनाया गया था और थैले में रखकर लोगों के बीच प्लांट किया गया था। घटना से पहले हमलावर ने पुलिस को ब्लास्ट के बारे में दो बार फोन करके चेतावनी भी दी थी।

1996 अटलांटा बम ब्लास्ट के पहले और बाद की तस्वीर।
1972 के मद्देनजर बम ब्लास्ट के चलते सरकारों की चिंता बढ़ गईं। हालांकि यूएस सरकार ने सुरक्षा सुनिश्चित करते हुए खेलों को जारी रखा। इस घटना के बाद यूएस में इस तरह की कई और घटनाएं देखने को मिलीं।
2003 में अटलांटा ब्लास्ट के मास्टरमाइंड एरिक रुडोल्फ को पकड़ लिया गया। जिसके बाद पता चला कि रुडोल्फ ने अमेरिका के अबॉर्शन कानून के चलते इन हमलों को अंजाम दिया था। 2005 में उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
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ओलिंपिक सीरीज के पांचवे और आखिरी एपिसोड में जानेंगे कि भारत में खिलाड़ियों को ओलिंपिक में भेजने की शुरुआत कैसे हुई? क्या था सचिन और कांबली का ओलिंपिक कनेक्शन…
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रेफरेंस-
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